🔱 गुप्त नवरात्रि विशेष – पंचमी महाविद्या: माँ त्रिपुर भैरवी
क्या माँ भैरवी केवल उग्र शक्ति हैं... या आपके भीतर छिपी दिव्य ऊर्जा को जागृत करने वाली आदिशक्ति?
ग्रंथों के अनुसार दस महाविद्याओं में पांचवें स्थान पर आने वाली माँ त्रिपुर भैरवी (Maa Tripura Bhairavi) का स्वरूप अत्यंत उग्र, प्रचंड और साथ ही परम कल्याणकारी है तंत्र शास्त्र में इन्हें 'भय का नाश करने वाली' और 'सृष्टि के परिवर्तन की शक्ति' माना गया है
भैरवयामल तंत्र और नारद पंचरात्र के अनुसार, माँ भैरवी भगवान शिव के सबसे उग्र रूप 'काल भैरव' की तांत्रिक शक्ति हैं
तोडल तंत्र के अनुसार, भगवान विष्णु के 'नृसिंह अवतार'
(Lord Narasimha) की उत्पत्ति माँ भैरवी के तेज से हुई थी। जिस तरह भगवान नृसिंह ने अत्यंत उग्र रूप धरकर प्रह्लाद की रक्षा की थी, उसी तरह माँ भैरवी अपने भक्तों के भय को खा जाती हैं
माँ भैरवी को अक्सर श्मशान में शिव (जो शव के समान शांत हैं) के ऊपर आरूढ़ दिखाया जाता है। इसका दार्शनिक अर्थ है कि "शक्ति के बिना शिव भी निष्क्रिय हैं" माँ भैरवी को 'वाक-सिद्धि' (Power of Speech) की देवी माना जाता है
'कामाख्या' का वह गुप्त स्थान जहाँ पैर कांपते हैं :असम के कामाख्या पीठ में जहाँ माँ भैरवी का मुख्य तांत्रिक स्थान है, वहाँ आम भक्तों को केवल मुख्य गुफा दिखाई देती है। लेकिन इसके ठीक पीछे एक अत्यंत संकरा और अंधेरा रास्ता है, जिसे 'भैरवी गुफा' कहा जाता है इस गुफा में २४ घंटे बिना तेल का एक गुप्त दीपक जलता रहता है, जिसे तांत्रिक 'अखंड योनि ज्योति' कहते हैं यहाँ की हवा में हमेशा एक अजीब सी गंध (जैसे खून या ताजी कटी मिट्टी की खुशबू) महकती रहती है आधी रात के बाद इस जगह पर आम इंसानों का जाना सख्त मना है क्योंकि यहाँ ऐसी पराशक्तियां (Entities) घूमती हैं जिनकी आवाजें और पैर की आहटें साफ सुनी जा सकती हैं
जब माता सती के पिता राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया और भगवान शिव का अपमान किया, तब सती उस यज्ञ में जाने के लिए आतुर थीं। लेकिन भगवान शिव ने उन्हें वहां जाने की अनुमति नहीं दी जब शिव जी ने सती का रास्ता रोका, तो माता अत्यधिक क्रोधित हो गईं। उन्होंने भगवान शिव को अपनी वास्तविक शक्ति का अहसास कराने के लिए स्वयं को दस महाविद्याओं में विभाजित कर दिया। जब शिव जी भयभीत होकर अलग-अलग दिशाओं में भागने लगे, तब माता ने दसों दिशाओं में उनका रास्ता रोक लिया। उस समय 'दक्षिण-दक्षिण पूर्व' (Agni Kon/South-East) दिशा में जो प्रचंड, अग्नि जैसी धधकती हुई शक्ति खड़ी थी, वे स्वयं माँ भैरवी थीं। उनके इस उग्र रूप को देखकर महादेव को भी शक्ति की सर्वोच्चता स्वीकार करनी पड़ी
ज्योतिषीय दृष्टि से अनेक तांत्रिक परंपराओं में माँ भैरवी का संबंध मंगल ग्रह तथा अग्नि तत्व से जोड़ा जाता है। यदि कुंडली में भय, आत्मविश्वास की कमी, बार-बार असफलता, निर्णय लेने में कमजोरी, क्रोध का असंतुलन या जीवन में साहस की कमी हो, तो श्रद्धापूर्वक माँ भैरवी की उपासना को आत्मबल, इच्छाशक्ति और कर्मशक्ति जागृत करने वाली साधना माना गया है।
माँ भैरवी का सबसे प्रसिद्ध तांत्रिक उपासना स्थल असम का कामाख्या शक्तिपीठ माना जाता है, जहाँ उनका एक अत्यंत पूजनीय भैरवी स्थान है। इसके अतिरिक्त पुरी का माँ विमला मंदिर भी तांत्रिक परंपरा में विशेष महत्व रखता है। गुप्त नवरात्रि में इन स्थलों पर विशेष साधना और उपासना की जाती है।
माँ भैरवी को लाल गुड़हल के पुष्प, लाल वस्त्र, सिंदूर, कुमकुम, शुद्ध घी का दीपक, नारियल, खीर, मालपुआ तथा उड़द के दही-बड़े अर्पित करना शुभ माना गया है। सामान्य साधकों के लिए "ॐ ह्रीं भैरव्यै नमः" अथवा "ह्रीं भैरवी कलौं ह्रीं स्वाहा" मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप, सात्त्विक जीवन और मन की शुद्धता ही सर्वोत्तम साधना मानी गई है।
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